भगवान ने गोवर्धन पर्वत क्यो उठाया?
अगर कोई व्यक्ति, इंद्र की तरह, अपने पद, शक्ति, या सफलता पर गर्व (अहंकार) करता है, तो भगवान उसी पद या स्थिति के माध्यम से उसका अहंकार तोड़ देते हैं। जैसे — इंद्र को लगा कि “वर्षा करवाने वाला मैं हूँ, इसलिए सबको मेरी पूजा करनी चाहिए।” यह अहंकार था। भगवान श्रीकृष्ण ने उसी वर्षा (जो इंद्र का कार्य था) के माध्यम से इंद्र को नम्र बना दिया — उन्होंने गोवर्धन पर्वत उठाकर दिखाया कि सच्ची शक्ति ईश्वर की है, न कि किसी देवता या मनुष्य की। इसलिए जब हम अपने पद, ज्ञान या सामर्थ्य पर घमंड करते हैं, तो भगवान उसी चीज़ से हमें विनम्र बनाना सिखाते हैं — ताकि हम समझ सकें कि सब कुछ उन्हीं (श्रीकृष्ण) की कृपा से है, हमारा सामर्थ्य कुछ भी नहीं और और जो कृष्ण की शरण में जाता है — उसे जीवन के हर “प्रलय” यानी संकट से सुरक्षा मिलती है। इसलिए, अहंकार से नहीं, विनम्रता से ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है