भूमिका
कहते हैं कि कंस का बल अतुल्य था, उसका पराक्रम ऐसा कि बड़े-बड़े योद्धा भी उसके सामने टिक नहीं पाते थे। पर क्या कभी आपने सोचा है कि इस महान बलशाली और पराक्रमी कंस का जन्म कैसे हुआ, और उसके भीतर यह अदम्य शक्ति कहाँ से आई? आइए, जानते हैं उसके पूर्वजन्मों और असाधारण कर्मों की गाथा, जैसा कि देवर्षि नारद ने राजा बहुलाश्व को बताया था।
🌌 कंस का पूर्वजन्म – कालनेमि असुर
बहुत समय पहले की बात है, एक कालनेमि नामक असुर था, जिसकी शक्ति और अहंकार का कोई सानी नहीं था। उसने समुद्र मंथन के दौरान स्वयं भगवान विष्णु से युद्ध किया था। उस भयंकर युद्ध में, भगवान विष्णु ने कालनेमि का वध कर दिया। परंतु, असुरों के गुरु शुक्राचार्य अपनी संजीवनी विद्या के बल पर उसे पुनः जीवित करने में सफल रहे। मृत्यु के इस अनुभव ने कालनेमि के मन में भगवान विष्णु से प्रतिशोध लेने की तीव्र इच्छा जगा दी।
इसी प्रतिशोध की अग्नि में तपकर, कालनेमि ने मंदार पर्वत के समीप जाकर ब्रह्माजी की तपस्या आरंभ की। सौ वर्षों तक, उसने केवल घास का रस पीकर घोर तपस्या की, जिससे ब्रह्माजी अत्यंत प्रसन्न हुए। ब्रह्माजी ने उसे वरदान देने की बात कही, तो कालनेमि ने माँगा, “मुझे भगवान विष्णु और किसी भी देवता से मृत्यु न मिले।” ब्रह्माजी ने कहा कि यह वरदान अत्यंत दुर्लभ है, परंतु उसे यह किसी और समय मिल सकता है। ब्रह्माजी के इसी वरदान के फलस्वरूप, कालनेमि ने पृथ्वी पर पुनः जन्म लिया।
इस बार उसने राजा उग्रसेन की पत्नी पद्मावती के गर्भ से जन्म लिया और कंस के नाम से जाना गया। बचपन से ही, कंस में असाधारण बल के लक्षण दिखाई देने लगे थे। वह पहलवानों के साथ कुश्ती लड़ने में आनंद लेता था और उनमें से सर्वश्रेष्ठ बन गया।
कंस की शक्ति का एक और प्रमाण तब मिला, जब मगधराज जरासंध अपनी दिग्विजय यात्रा पर निकले और उनकी सेना यमुना नदी के किनारे ठहरी। जरासंध के पास कुवलयापीड़ नामक एक विशाल हाथी था, जो हजार हाथियों जितना बलशाली था। एक दिन, वह हाथी बेकाबू होकर उस अखाड़े में जा पहुँचा, जहाँ कंस कुश्ती लड़ रहा था। सभी डरकर भाग गए, लेकिन कंस ने अकेले ही उस हाथी की सूंड पकड़कर उसे पटक दिया और उठाकर जरासंध की सेना में फेंक दिया। कंस की इस अद्भुत शक्ति से जरासंध इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपनी दो पुत्रियों, अस्ति और प्राप्ति, का विवाह कंस से कर दिया। उपहार स्वरूप, उसने कंस को घोड़े, हाथी, रथ और सेवक दिए, जिससे कंस की शक्ति और प्रभाव और बढ़ गया।
🏹 कंस की दिग्विजय यात्राएँ
कंस युद्ध का प्रेमी था और उसने अपनी विजय यात्राएं जारी रखीं।
- वह माहिष्मती नगरी पहुँचा, जहाँ उसने चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल जैसे प्रसिद्ध पहलवानों को मल्लयुद्ध में एक-एक करके परास्त किया।
- इसके बाद, कंस प्रवर्षणगिरि पर्वत पर गया और वहाँ द्विविद नामक वानर से बीस दिनों तक लगातार युद्ध किया। अंततः, उसने द्विविद को भी पराजित कर अपना सेवक बना लिया।
- फिर वह ऋष्यमूक वन गया, जहाँ केशी नामक एक महादैत्य घोड़े के रूप में रहता था। कंस ने उसे भी पराजित कर अपने वश में कर लिया।
अपनी विजय यात्रा के दौरान, कंस महेंद्रगिरि पर्वत पर पहुँचा और वहाँ उसने सौ बार पर्वत को उठाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। वहाँ उसने परशुरामजी के चरणों में प्रणाम किया। परशुरामजी ने उसे भगवान विष्णु द्वारा दिया गया भारी धनुष दिया और एक भविष्यवाणी की: “जो इस धनुष को तोड़ देगा, वही साक्षात पूर्ण पुरुष होगा और वही तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगा।”
🐍 अन्य दैत्यों से युद्ध और मित्रता
कंस ने केवल मनुष्यों और जानवरों को ही नहीं, बल्कि कई शक्तिशाली दैत्यों को भी पराजित किया था:
- अघासुर (साँप जैसा दानव): कंस ने उसे हरा दिया और उसकी माला बना ली।
- अरिष्टासुर (बैल जैसा दानव): कंस ने उसे अपने मुक्कों से पराजित किया।
- प्रलंबासुर: कंस ने उसे पकड़कर जमीन पर पटक दिया।
- धेनुकासुर: कंस ने घूँसों से मारकर उसे चूर-चूर कर दिया।
- तृणावर्त: यह दानव कंस को आकाश में ले गया, लेकिन कंस ने उसे खींचकर धरती पर पटक दिया।
- बकासुर: उसने कंस को निगल लिया, लेकिन कंस के कठोर शरीर से वह घुटने लगा और उसे फिर उगल दिया।
- पूतना: कंस ने उससे युद्ध नहीं किया और उसे अपनी बहन मान लिया।
- भौमासुर (नरकासुर): उसने भी कंस की अपार शक्ति देखकर उसकी मित्रता स्वीकार कर ली।
उसकी यात्रा यहीं समाप्त नहीं हुई। नारदजी ने बताया कि कंस ने अपने जीते हुए प्रलंब आदि दैत्यों के साथ शंबरासुर के नगर पर धावा बोला, लेकिन शंबरासुर ने युद्ध करने के बजाय उससे मित्रता कर ली। फिर उसने त्रिकूट पर्वत पर सो रहे बलशाली व्योमासुर को लात मारकर जगाया। क्रोधित व्योमासुर ने कंस पर मुक्के बरसाए, जिससे भयंकर युद्ध छिड़ गया। अंततः, कंस की मार से व्योमासुर कमजोर पड़ गया और उसने कंस की अधीनता स्वीकार कर ली। नारदजी के पूछने पर कंस ने उनसे और युद्ध करने की इच्छा जताई। नारदजी ने उसे बाणासुर के पास जाने को कहा। कंस की युद्ध-इच्छा सुनकर बाणासुर क्रोधित हुआ और उसने पृथ्वी पर पैर मारा, जिससे उसका पैर घुटने तक जमीन में धंस गया। उसने कंस को चुनौती दी कि पहले उसका पैर निकालकर दिखाए। कंस ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उसका पैर उखाड़ दिया, जिससे सारी पृथ्वी और पाताल हिल उठे। तभी भगवान शंकर वहां आए और दोनों को समझाकर युद्ध रुकवा दिया। शिवजी ने बाणासुर से कहा कि श्रीकृष्ण को छोड़कर कोई भी कंस को नहीं हरा सकता, क्योंकि परशुरामजी ने उसे वरदान और अपना वैष्णव धनुष दिया है।
इसके बाद कंस पश्चिम दिशा में वत्सासुर से लड़ने गया। वत्सासुर ने बछड़े का रूप धारण कर कंस से युद्ध किया, लेकिन कंस ने उसकी पूंछ पकड़कर उसे पटक दिया और उसके पर्वत पर अधिकार कर लिया। जब कालयवन को कंस के आक्रमण का पता चला, तो वह अपनी गदा लेकर युद्ध के लिए आया। दोनों के बीच भयंकर गदा-युद्ध हुआ। उनकी गदाओं की टक्कर से चिंगारियां उड़ने लगीं, और अंत में कंस ने कालयवन को उठाकर पटक दिया, जिससे वह बेहोश हो गया। फिर कंस ने उसकी सेना का संहार कर दिया। म्लेच्छ सैनिक डरकर भाग गए, पर कंस ने भागते हुए सैनिकों पर हमला नहीं किया।
⚔️ अमरावती पर आक्रमण – इंद्र से युद्ध
सबसे हैरतअंगेज़ घटना तब हुई जब कंस ने अमरावती (इंद्रलोक) पर आक्रमण किया। उसके साथ चाणूर, मुष्टिक, केशी, प्रलंबासुर, अघासुर, शंबरासुर, बाणासुर, वत्सासुर जैसे अनेक शक्तिशाली दैत्य थे। देवराज इंद्र अपनी सेना के साथ युद्ध करने आए। देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। इंद्र ने कंस पर वज्र फेंका, लेकिन कंस ने अपनी गदा से वज्र को तोड़ दिया। फिर इंद्र ने तलवार से हमला किया, पर कंस पर कोई असर नहीं हुआ। इसके बाद कंस ने इंद्र पर भारी गदा से प्रहार किया, जिससे इंद्र मूर्छित हो गए। देवताओं ने कंस पर बाणों की वर्षा की, लेकिन बाणासुर ने उन्हें अपने धनुष से घायल कर दिया। इस बीच, इंद्र फिर से अपने ऐरावत हाथी पर चढ़कर कंस से लड़ने आए। कंस ने पहले इंद्र को मुक्का मारा, जिससे वे ऐरावत से गिर गए। फिर कंस ने ऐरावत की सूंड पकड़कर उसे पटक दिया और उसके दांत तोड़ दिए। इसके बाद कंस ने अपने वैष्णव धनुष से देवताओं पर बाणों की बौछार कर दी, जिससे वे भाग खड़े हुए। कुछ ने अपने हथियार डाल दिए, तो कुछ ने डरकर प्रार्थना की। अंततः, देवताओं की हार हुई और कंस अमरावती से जीतकर अपनी राजधानी मथुरा लौट आया।
इस प्रकार, कंस ने अपनी अपार शक्ति और अदम्य पराक्रम से कई शक्तिशाली योद्धाओं और दैत्यों को पराजित किया और पूरे भूभाग पर अपना प्रभाव जमा लिया। उसका नाम सुनते ही लोगों के दिल कांप उठते थे, और वह एक ऐसे शासक के रूप में जाना जाने लगा, जिसने अपनी इच्छाशक्ति और बल से सब कुछ जीत लिया था।
✨ मुख्य सीख (Takeaway)
- असुर चाहे कितना भी बलशाली क्यों न हो, उसका अंत अवश्य होता है।
- कंस की शक्ति अपार थी, परंतु उसका गर्व और अत्याचार ही उसके विनाश का कारण बने।
- अंततः भगवान श्रीकृष्ण ने ही कंस का अंत कर धर्म की रक्षा की।
- कंस की दिग्विजय कथा हमें यह सिखाती है कि चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः उसका अहंकार और अत्याचार दिव्य न्याय से बच नहीं सकता।
- देवताओं पर विजय पाकर भी कंस अपने भाग्य से नहीं बच पाया, क्योंकि उसका अंत भगवान श्रीकृष्ण के हाथों निश्चित था।